Tuesday, June 30, 2015

माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो......!


आज मम्मी का जन्मदिन है ! वैसे तो कोई बेटा अपनी माँ को क्या दे सकता है क्योंकि सबकुछ तो उनका ही का दिया हुआ है पर फिर भी आज उनके जन्मदिवस उनके सदैव स्वस्थ रहने और दीर्घायु होने की कामना के साथ शास्त्री नित्यगोपाल कटारे की लिखी यह बेहद मार्मिक कविता मैं अपनी मम्मी को समर्पित करता हूँ !

तुम्ही मिटाओ मेरी उलझन, कैसे कहूँ कि तुम कैसी हो ! 
कोई नहीं सृष्टि में तुम-सा, माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो । 


ब्रह्मा तो केवल रचते है तुम तो पालन भी करती हो
शिव हरते तो सब हर लेते, तुम चुन-चुन पीड़ा हरती हो
किसे सामने खड़ा करूँ मैं और कहूँ फिर तुम ऐसी हो !
कोई नहीं सृष्टि में तुम-सा, माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।


ज्ञानी बुद्ध प्रेम बिन सूखे, सारे देव भक्ति के भूखे, 
लगते हैं तेरी तुलना में, ममता बिन सब रुखे-रुखे,

पूजा करे, सताए कोई, सब के लिए एक जैसी हो।
कोई नहीं सृष्टि में तुम-सा, माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।


कितनी गहरी है अदभुत-सी, तेरी यह करुणा की गागर,
जाने क्यों छोटा लगता है, तेरे आगे करुणा-सागर, 

जाकी रही भावना जैसी, मूरत देखी तिन्ह तैसी हो ।
कोई नहीं सृष्टि में तुम-सा, माँ तुम बिलकुल माँ जैसै हो।।


मेरी लघु आकुलता से ही, कितनी व्याकुल हो जाती हो 
मुझे तृप्त करने के सुख में, तुम भूखी ही सो जाती हो।

सब जग बदला मैं भी बदला, पर तुम वैसी की वैसी हो।
कोई नहीं सृष्टि में तुम-सा, माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।


तुम से तन मन जीवन पाया, तुमने ही चलना सिखलाया,
पर देखो मेरी कृतघ्नता, काम तुम्हारे कभी न आया

क्यों करती हो क्षमा हमेशा, तुम भी तो जाने कैसी हो !
कोई नहीं सृष्टि में तुम-सा, माँ तुम बिलकुल माँ जैसी हो।।



-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

Saturday, June 27, 2015

Happy Birthday "Pancham Da"

R D Burman "Pancham" यह नाम सुनते ही कानों में जैसे अनगिनत बेहतरीन और सदाबहार नगमे गूंजने लगते हैं ! लोग जब कभी मुझसे पूछते हैं कि आपका पसंदीदा संगीतकार कौन है तो मेरा हमेशा एक ही जवाब होता One & Only "Pancham". हिंदी फिल्मों में संगीत का सबसे उम्दा दौर 70 और 80 का दशक था जब किशोर कुमार, और पंचम की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को सबसे बेहतरीन नगमे दिए !
तीसरी मंजिल, पड़ोसन, परिचय, कटी पतंग, अमर प्रेम, नमक हराम, आपकी कसम, यादों की बारात, हम किसी से कम नहीं, आंधी, खुशबू, मासूम, इजाज़त, सागर, परिंदा और 1942 A Love Story जैसी न जाने और कितनी अनगिनत फिल्मों में पंचम के गीतों का जादू आज भी हम सब के सर चढ़ कर बोलता है !
R D Burman "Pancham" को जन्मदिन की शुभकामनाएं ! आप न होते तो शायद हमें संगीत इतना न पसंद होता !

Friday, June 12, 2015

अंतर्द्वंद.................!

चाँद-चांदनी, अगणित तारे, तरु-पल्लव, कलियाँ क्यों हैं !
धरती, अम्बर, बादल, पर्वत, खेत और नदियाँ क्यों हैं !
क्यों होते दिन-रैन, समय क्यों सदा निरंतर चलता है !
क्यों मौसम आते जाते, सूरज क्यों रोज़ निकलता है !
कहाँ छुपा बैठा है वो जिसने यह सारा खेल रचा !
हम रोते निशिदिन और वो भीतर ही भीतर हँसता है !
आज पूछता हूँ उससे काहे को यह जंजाल रचा !
हे परमेश्वर ! किसकी खातिर यह सब मायाजाल रचा ?

यह पाप-पुण्य, यह झूठ-सत्य, यह धर्म-अधर्म रचा क्यों है !
क्यों अंतस में अनुराग दिया, जीवन वैराग्य रचा क्यों है !
क्यों जन्म हुआ, क्यों मरण हुआ, किसने भेजा, कुछ ज्ञान नहीं !
क्यों लक्ष्य-विहीन बढ़े पथ पर जिसकी सीमा का भान नहीं !
तुम हर्ष-शोक से दूर तो किसके लिए यज्ञ और आराधन,
यह भजन, आरती, और अजान, होता है फिर किसका पूजन !
जब आदि नहीं, कोई अंत नहीं फिर किसको खोजा जाता है !
चिर शून्य विलीन भटक मरते, है मोक्ष कहाँ कुछ ज्ञान नहीं !

जैसे जैसे कुछ ज्ञान बढ़ा, वैसे वैसे कुछ शोक बढ़ा !
जब प्रेम बढ़ा, वैराग्य बढ़ा जब आयु बढ़ी तब रोग बढ़ा !
हमसे पहले कितने आये कितने आगे भी आयेंगे !
यह भार लिए कांधों पर बस एक दिन जीवन से जायेंगे !
इस कष्टों के भवसागर का मिलता न पारावार कोई !
हम जाएँ कहाँ, है अंत कहाँ, है नहीं कहीं आधार कोई !
हम हार चुके इस जीवन से, अब हमे उबारो हे ईश्वर !
लीला प्रसार यह बंद करो ! अब हमे बुला लो परमेश्वर !


::::: अम्बेश तिवारी


रचना काल : दिनांक : 12 जून 2015 दिन शुक्रवार 

Thursday, July 31, 2014

क्या तुम्हे कुछ याद है ?




मेरे अग्रज श्री गोपाल तिवारी ने मुझे whatsapp पर अपने खड़गपुर (प.बंगाल) स्थिति निवास के पास वाले सरोवर के तट पर खींची गयी यह मनोरम दृश्य वाली तस्वीर भेजी थी जिसे देख कर मन में कुछ पंक्तियाँ पनपने लगी......|
कागज पर उतारा तो वो पंक्तियाँ एक पूरी कविता का रूप ले चुकी थी जिसे ब्लॉग के माध्यम से आप सबसे शेयर कर रहा हूँ.......

क्या तुम्हे कुछ याद है ?
वो सरोवर के किनारे बैठकर,
याद है तुमने कहा था प्रेम से !
पल तुम्हे यह याद आयेंगे सदा !
पर भुला बैठी हो अब वो बात भी !
क्या तुम्हे कुछ याद है ?

मंदिरों से गूँजतीं वो आरती की स्वर लहरियां,
आँख मूंदे वो तुम्हारा मुख अलौकिक !
प्रार्थना में हाथ जोड़े तुम खड़ी थी !
और मैं तब एकटक !
उस दिव्य प्रतिमा से तुम्हारे रूप में बस खो गया था !
क्या तुम्हे कुछ याद है ?

उस सरोवर में खिले थे पुष्प कुछ नीले कमल के !
और मैं करता तुम्हारे रूप की तुलना उन्हीं नीले कमल से !
मुस्कुरा कर तुम कभी नज़रें झुकाती !
या कभी इतरा के फिर यूँ खिलखिलाती !
और मैं बस एकटक उस फूल सी खिलती हंसीं में खो गया था !
क्या तुम्हे कुछ याद है ?

याद है वो रात्रि का अंतिम मिलन पल !
पूर्णिमा के चन्द्र का प्रतिबिम्ब जब जल में हिलोरे ले रहा था !
मन मेरा विचलित था विरह की चुभन से !
पर तुम्हे ढाढस बंधाने के लिए मैं हंस रहा था !
अश्रु जो निकला तुम्हारी आँख से तो !
रख लिया मुट्ठी में मैंने यूँ समझ मोती उसे !
क्या भुला दोगी वो अपने कांपते अधरों पे मेरा विरह-चुम्बन !
उस मिलन की याद में अब तक खड़ा हूँ !
मैं उसी तट पर जहाँ तुमने कहा था !
पल तुम्हे यह याद आयेंगे सदा !
पर भुला बैठी हो अब वो बात भी !
क्या तुम्हे कुछ याद है ?


:::अम्बेश तिवारी 
रचना काल : 30.07.2014 

Friday, July 4, 2014

मैं अयोग्य हूँ !

हाँ ! सच कह रहे हैं आप ! मैं अयोग्य हूँ.....
क्योंकि योग्यता के आपके कुछ मापदंड हैं,
जो आपने नहीं बनाये पर बनाये हैं इस समाज ने..
आप तो केवल उन मापदंडों के आधार पर मेरा मुल्यांकन करते हैं
मुझे तौल-परख कर फिर नकारा करार करते हैं !
सच है कि मैं एक मामूली नौकरी करके मुश्किल से अपना खर्च चला पाता हूँ,
रोज़ कुआँ खोदता हूँ रोज़ पानी लाता हूँ !
सच है कि मैं नहीं बना पाया कोई भी प्रॉपर्टी,
और मेरे बैंक खाते में नाम मात्र की रकम रहती है !
यह भी सच है मेरे घर में पैसों कि जगह
सिर्फ उम्मीदों और तसल्ली की बयार बहती है !
तो क्या हुआ अगर मेरे पास दुनिया भर का ज्ञान है !
और जिसके कारण कुछ गिने चुने लोगों की नज़रों में
मेरा थोडा बहुत मान है !
पर ऐसे ज्ञान और मान का क्या है फायदा ?
जो मुझे दौलत और शोहरत न दिला सके
कोई मकान, प्रॉपर्टी, या बैंक बैलेंस भी न बढ़ा सके !
गलत पढाया गया था हमें किताबों में
कि दौलत और स्वास्थ्य भले चला जाये,
पर इंसान का चरित्र नहीं गिरना चाहिए !
क्योंकि मेरे चरित्र में तो कोई खराबी नहीं है,
सिवाय इसके कि बोल देता हूँ कड़वा सच !
यह सोचे बगैर कि इसका परिणाम मेरे विपरीत भी हो सकता है !
शायद यही मेरी असफलता का सबसे बड़ा कारण है,
क्योंकि मैं अयोग्य हूँ आपकी नज़रों में !
क्योंकि इस समाज के बनाये पैमानों पर मैं खरा नहीं उतरता !
हाँ ! सच कह रहे हैं आप ! मैं अयोग्य हूँ.....


 ::::अम्बेश तिवारी 

Tuesday, May 20, 2014

मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ.....?


मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ, मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ....?

जब हो कन्धों पर भार प्रिये ! दिखता न कोई उपचार प्रिये !
हर ओर मचा कोहराम यहाँ, हो रक्तपात अविराम यहाँ,
निज सुख की इच्छा रखूँ बस, दृग मींच तुम्हारा ध्यान करूं,
कैसे यह कष्ट भुलाकर सब, मैं प्रीत-सुधा का पान करूं,
जलती वसुधा, बढ़ता मरुथल, यह सब मैं कैसे बिसराऊँ ?
मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ, मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ.........?

जब सीमा के प्रहरी का शव मस्तकविहीन हो जाता है,
और देश का शासक कर्णधार निद्रा विलीन हो जाता है,
जब महंगाई के बोझ तले मरता किसान और श्रमिक यहाँ,
और नन्हा शिशु बिन भोजन के रोते-रोते सो जाता है,
तब कहो प्रिये कैसे मैं तुम्हारे रूप-जाल में खो जाऊं ?
मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ, मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ........?

जब चलते वाहन में बेटी का मान भंग हो जाता है,
रक्षक बन भक्षक कर प्रहार लज्जाविहीन मुस्काता है,
संतो का वेश बनाकर जब करता कुकर्म यह नर पिशाच,
और धनबल से अपने सारे अपराधों को धो जाता है,
तब कहो तुम्हारे आँचल में छिपकर कैसे मैं सो जाऊं ?
मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ, मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ............?

है राष्ट्र प्रथम, फिर निज कुटुंब, फिर निज सुख का अधिकार हमें,
जब कर्तव्यों को पूर्ण करें तब साधन हो स्वीकार हमें,
है ज्ञात मुझे इन बातों से मन व्यथित तुम्हारा होता है,
पर रोता है जब राष्ट्र प्रिये ! मेरा भी तो मन रोता है,
ऐसे में केवल पोंछ तुम्हारे अश्रु, मैं कैसे मुस्काऊँ ?
मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ, मैं प्रेम गीत कैसे गाऊँ.....?

:::अम्बेश तिवारी 

Sunday, May 18, 2014

बेनिया पुनिया सब गए....

इस ठेठ देहाती भाषा में लिखी गयी रचना की प्रेरणा भी मेरे मित्र डा.पवन मिश्रा ने ही दी । हुआ यूँ कि चुनाव परिणामों के बाद देर शाम हमारी बातचीत हुई जिसमे कांग्रेस सपा और बसपा के चुनाव पूर्व के बड़बोले नेताओं को जनता द्वारा दिये गए करारे जवाब की चर्चा हुई । तब पवन जी ने मुझसे कुछ अपनी भाषा में लिखने को कहा और परिणाम स्वरुप यह छंद निकल आया...

बेनिया, पुनिया सब गए, हारि गवा सलमान,
जैसवाल की भद पिटी, खूब भयो अपमान ।
खूब भयो अपमान के माया हुई गयी सुन्ना,
नेता जी दुई सीट में मा जीत के रह्यो चौकन्ना ।
जेहिका छोड्यो जाई भाजपा के पाले मा,
नीके फंस जईहो तुम अपने ही जाले मा ।
कहत कवि अम्बेश, न लीन्हो कोऊ पंगा,
बुई के पेड़ बबूल, आम तुम पईहो ठेंगा ।

::::अम्बेश तिवारी

होली पर व्यंग्य कविता

 होली पर व्यंग्य कविता  अबकी होली पर दिल्ली ने बदला ऐसा रंग, छोड़ आप का साथ हो गयी मोदी जी के संग, मोदी जी के संग करो मत महंगाई की बात, अपने ...