Sunday, August 19, 2018

डर लगता है सचमुच डर लगता है !!

डर लगता है सचमुच डर लगता है !!

अटल जी के प्रति मेरी और मेरे जैसे करोड़ों भारतवासियों की श्रद्धा जैसी आज है वैसी ही हमेशा बनी रहेगी परंतु डर लगता है कि कहीं जैसे आज चुनावी ध्रुवीकरण और दलगत वैमनस्यता के चलते गाँधी जी और पं.नेहरू की देश सेवा और तमाम उपलब्धियों को दरकिनार करते हुए भाजपा और संघ ब्रिगेड द्वारा उनका चारित्रिक चीरहरण किया जाता है और उन्हें देश का सबसे बड़ा खलनायक साबित करने की पुरजोर कोशिश की जाती है वैसे ही आज से 20-25 साल बाद जब मोदी शाह का अवसान हो चुका होगा और कोई और राजनैतिक विकल्प देश को मिलचुका होगा उस समय चुनाव जीतने के लिये इसी तरह अटल जी का भी चारित्रिक चीरहरण न किया जाये।

बहुत सी ऐसी बातें थीं अटल जी के जीवन में जिनका छिद्रान्वेषण करके और उन्हें गलत परिपेक्ष्य में प्रस्तुत करके नीच मानसिकता वाले कुण्ठित लोग उनके चरित्र पर उँगलियाँ उठा सकते हैं ।

मसलन यदि नेहरू जी सिगरेट पीते थे तो अटल जी भाँग खाते थे !
मदिरापान दोनों करते थे !!
नेहरू बीफ खाते थे तो अटल जी झींगा मछली खाते थे !
नेहरू के जीवन में एडविना थीं तो अटल जी के जीवन में श्रीमती कौल !
अटल जी की स्वयम स्वीकारोक्ति कि "अविवाहित हूँ कुँवारा नहीं" तात्कालिक निहितार्थ निकाले जा सकते हैं !

राजनीति की बात करें तो लाहौर बसयात्रा के तुरंत बाद कारगिल, फिर कन्धार अपरहण में आतंकियों को छोड़ा जाना, पेंशन खत्म करना, सरकारी कंपनियों के विनिवेश की शुरुआत, मुशर्रफ के साथ असफल आगरा समिट, संसद पर आतंकी हमला इंडिया शाइनिंग का असफल होना आदि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिनपर उन्हें खलनायक बनाया जा सकता है ।
अब जैसे नेहरू की तमाम उपलब्धियों की कोई चर्चा नहीं होती वैसे ही अटल जी की उपलब्धियों को छिपाया जा सकता है ।
सन 2000 के बाद पैदा होने वाली पीढ़ी जब 35-40 बरस की होगी तब उसका भी ब्रेनवाश ऐसे ही किया जा सकता है जैसे आज की पीढ़ी का किया जा रहा है । क्योंकि इतिहास तो वैसे भी अब किताबों में न पढ़ा कर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी में ही पढ़ाया जाता है ।

डर लगता है सचमुच डर लगता है !!

Monday, May 14, 2018

Mother's Day पर !!

कल Mother's Day पर हर कोई अपनी अपनी माँ के साथ तस्वीर पोस्ट कर रहा था ! और मैं इन सब तस्वीरों को देख कर सोच रहा था कि काश मैं भी यह कर सकता !! पर अब माँ सिर्फ तस्वीरों में हैं और मैंने कभी उनके साथ ऐसी कोई तस्वीर ली ही नहीं । क्योंकि मैं उनसे कभी अलग ही नहीं हुआ !!
वक़्त कितना निष्ठुर है !! आज फिर से बच्चा बनकर माँ की गोद में लेटने की इच्छा होती है पर क्या करूँ !!

वक़्त को पीछे खींच सकूँ मैं वो जंजीर कहाँ से लाऊँ ?
मेरा हर दिन फिर रोशन हो वो तक़दीर कहाँ से लाऊँ ?
उसकी ममता की छाया में मैं निश्चिंत, निडर विश्वासी,
माँ की गोद में सिर रख सोऊँ, वो तस्वीर कहाँ से लाऊँ !!

अम्बेश तिवारी
14/05/2018

Monday, September 18, 2017

मम्मी की बरसी

आज मम्मी की पहली पुण्यतिथि है ! एक वर्ष पहले आज ही दिन मम्मी हम सब को छोड़ कर चली गईं थीं ! एक वर्ष में करोड़ों पल और हर पल जैसे एक युग की तरह बीता ! मेरे लिए आज भी स्वीकार करना कितना मुश्किल है कि मम्मी तुम नहीं हो !

एक बरस यूँ बीत गया है
पर मानो हो कल की बात,
क्रूर काल ने छीन तुम्हें
हम सब पर किया वज्र-आघात !
जीने को तो जी ही लेंगे
जीवन जैसे-तैसे हम,
पर यह घर सूना है तुम बिन,
और तुम्हारी हर पल याद !
यह शरीर मरता हैं माँ ! पर
तुम तो मुझमें रची बसी हो,
मेरे मन को सदा यकीं है,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

Monday, June 5, 2017

उनवान लिख रहा हूँ !

उनवान लिख रहा हूँ गज़लों में ज़िदगी के,
आँसू में डूबी खुशियाँ, रोती हुई हंसी के |

सूरज कहीं डुबा दो ये रोशनी बुझा दो,
अरमान सिर्फ इतने होते हैं तीरगी के ।

मुस्कान तो चुका दी किश्तों में ब्याज देकर,
खुशियाँ हिसाब करती हैं क़र्ज़ और बही के ।

वो ख़त सभी जो तुमने मुझको लिखे थे, उनसे,
अब तक महक रहे हैं पन्ने भी डायरी के।

सब शौक आज़मा लो हर तिश्नगी बुझा लो,
मुझको भी तो चुकाने हैं कर्ज़ दिल्लगी के।

ज़ुल्फें सियाह रातें रुखसार माहताबी।
तुमको सिखा रहा हूँ अंदाज शायरी के !

ढेरों सुखनवरों में "अम्बेश" खो गया है,
फिर शौक भी तो खुद ही पाले हैं ग़ालिबी के !

Saturday, May 20, 2017

उठो लाल अब आँखें खोलो !

मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर 16 मई 2017 को लिखी गयी व्यंग्य कविता -

उठो लाल अब आँखें खोलो,
तीन साल हो गए कुछ तो बोलो !

सीमा पर नित सैनिक मरते,
और नक्सली हमले करते,
कोई एक्शन करो जनाब,
तुम तो केवल निन्दा करते !
रिश्वतखोरी अब भी वैसी,
महँगाई भी जैसी तैसी !
रोज़गार है कहाँ बताओ ?
कालाधन अब तो ले आओ !
बिना बात की मन की बात,
अब तो कर लो जन की बात !
समय निकलता उसे न खो,
मेरे प्यारे अब मत सो !!

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अम्बेश तिवारी

मन की बात

एक कविता -

कुछ अनकही सी बातें मेरे और तुम्हारे बीच
हवा में डोलती हैं,
हम कहते कुछ और हैं पर निगाहें कुछ और बोलती हैं !
समाज की मर्यादा, रिश्तों के बंधन और
उम्र की सीमायें रोकती है हमें !
तुम क्या सोचोगी, मैं क्या जवाब दूँगा,
यह आशंकाएं टोकती हैं हमें !
और हम रह जाते हैं सिर्फ Good morning, Good night, और Nice pic के बीच झूलते !
हर बार यही सोचते कि आज तो कह ही देंगे,
और हर बार फिर यही बात भूलते !
ज़िन्दगी यूँ ही धीरे धीरे निकल जायेगी हाथ से,
और हम रह जाएंगे दूर मन की बात से !

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अम्बेश तिवारी

Friday, February 17, 2017

हँस कर बड़े तपाक से मिलता जरूर है !

 हँस कर बड़े तपाक से मिलता ज़रूर है,

मुझमें भी मगर कोई तो तन्हा ज़रूर है.

तूफ़ान मुझ से हो के गुज़रते हैं किसलिए ,
कोई न कोई मुझमें भी रस्ता ज़रूर है.
जब भी सफ़र हो धूप का साए की तलब में,
हर शख्श मुझको देख के रुकता ज़रूर है.
चाँदी के चंद सिक्कों को कितना यक़ीन है,
ईमान चाहे देर से बिकता ज़रूर है.
क़िस्मत के जानकार नज़ूमी को देखिए,
लिखता नहीं है वो मगर पढता ज़रूर है.
ग़ज़लों की ज़ायदाद का वारिस नहीं हूँ मैं,
लेकिन ये सच है मेरा भी हिस्सा ज़रूर है.
सजदे में सर झुका के ये सूफ़ी ने बताया ,
फलदार पेड़ होते ही झुकता ज़रूर है.

होली पर व्यंग्य कविता

 होली पर व्यंग्य कविता  अबकी होली पर दिल्ली ने बदला ऐसा रंग, छोड़ आप का साथ हो गयी मोदी जी के संग, मोदी जी के संग करो मत महंगाई की बात, अपने ...