Wednesday, October 23, 2013

“फेसबुक” तुम्हारी जय हो !

यदि पहले भी सोशल मीडिया होता तो क्या होता? चलिए पहले आज से चार वर्ष पहले तक के उस पहलू पर विचार करते हैं कि जब अपनी आवाज़ को आम जनता तक पहुँचाने और अपने मन की बातों को सबके साथ बांटने का साधन यानी सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग इत्यादि इतने प्रचलित और सर्वप्राप्य नहीं थे तब कैसे हम चाह कर भी अपने मन कि बातें अपने मन में ही रखने को विवश होते थे | मुझे याद है मेरे एक मामा जो बैंककर्मी होने के साथ साथ लेखक, चिन्तक, और शिक्षाविद भी थे कैसे अपने लिखी हुई किताबों को छपवाने के लिए प्रकाशकों के चक्कर लगाया करते थे और यदि किताब छाप भी दी गयी तो उसे कितने लोग पढेंगे और समझेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं | खुद मैंने कितने लेख और पाठक के पत्र जैसे साधनों के जरिये अपने विचारों को दैनिक जागरण में छपवाने का असफल प्रयास किया है और न जाने मेरे जैसे कितने अनगिनत लोगों के विचार और लेख इसी तरह अख़बार के दफ्तरों की रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ा रहे होंगे | पर इसी विवशता का फायदा का हमारी सरकारों ने और हमारे शासकों ने कितनी बखूबी उठाया इस बात का अंदाज़ा आप नीचे लिखे कुछ सन्दर्भों से जरूर समझ जायेंगे |

हमें बचपन में इतिहास की किताबों में सिर्फ महात्मा गाँधी, नेहरु एंड फॅमिली, और कांग्रेस की गौरव गाथा पढाई जाती रही | हमें कभी यह नहीं पढाया गया कि जवाहर लाल नेहरु को प्रधानमंत्री के रूप में देश के ऊपर जबरदस्ती थोपा गया था, जबकि 1946 में हुए नामांकन में 15 प्रदेश कांग्रेस समितियों में से 12 ने सरदार पटेल का और 3 ने आचार्य कृपलानी का नाम प्रथम प्रधानमंत्री के लिए अनुमोदित किया था और किसी ने भी नेहरु का नाम प्रस्तावित नहीं किया था | बाद में गाँधी जी के कहने पर सरदार पटेल और कृपलानी जी ने अपना अपना नाम वापस ले लिया था | पर फिर भी नेहरु को हमेशा सरदार पटेल से ज्यादा महान नेता के रूप में चित्रित किया गया | अब सोचिये कि अगर तब फेसबुक और ट्विटर होता और कांग्रेस का कोई नेता इस बात को फेसबुक या ट्विटर पर लिख देता तो आज देश का इतिहास कुछ और होता |

सोचिये अगर भगत सिंह के पिता और मित्र फेसबुक और ट्विटर पर लिख देते की गाँधी जी ने उनके बेटे की फांसी रुकवाने का प्रयास सिर्फ इसलिए नहीं किया क्योंकि वो भगत सिंह की लोकप्रियता से डरते थे और वो नहीं चाहते थे की देश में कोई भी नेता ऐसा हो जो उनके सिद्धांतों के विपरीत किसी और नए सिद्धांत पर जनता को जागरूक कर दे | जैसे अर्जुन को द्रोणाचार्य ने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर साबित करने के लिए एकलव्य के अंगूठे की बलि दे दी थी उसी प्रकार गाँधी जी ने नेहरु प्रेम के कारण इस देश से भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस और सरदार पटेल जैसे कितने एकलव्यों की बलि दे दी |

सोचिये अगर चाइना वार के समय नेहरु का यह बयान कि “चीन ने जिस ज़मीन पर कब्ज़ा किया है वो बंज़र और बेकार है” आज के ज़माने में आया होता तो क्या वाकई नेहरु की छवि वैसी ही न होती जैसी आज राहुल गांधी की है ?
या इंदिरा की हत्या के बाद हुए सिखों के कत्लेआम के सवाल पर राजीव गाँधी का यह बयान कि “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो ज़मीन हिलती है” आज के दौर आया होता तो क्या वाकई राजीव को सहानभूति की वही लहर मिल पाती जैसी 1984 में मिली थी?

मूल रूप से देखा जाये तो आज भी देश की परिस्थितियां लगभग वैसी ही हैं जैसी आज़ादी के पहले थी पहले प्रेस की आज़ादी पर प्रतिबन्ध था और सिर्फ वही खबरें छपती थी जो सरकार चाहती थी आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सरकार का कब्ज़ा है, पैसे के बल पर सिर्फ वो खबरें दिखाई जा रही हैं जिनसे सरकार की छवि को कोई नुकसान न पहुंचे और असली ख़बरों को दबाने के लिए बकवास ख़बरों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जा रहा है | पहले आसाराम और अब उन्नाव का खज़ाना ! पर पहले क्रांतिकारियों के पास सोशल मीडिया जैसा कोई माध्यम नहीं था पर अब है, और यही फर्क सरकार को भारी पड़ रहा है | अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद सिर्फ यही एक ऐसा माध्यम है जहाँ सरकार का बस नहीं चल पा रहा है | मतलब पूरी बात का लब्बोलुआब यह है की फेसबुक जहाँ एक तरफ अपनी बात को सब तक पहुँचाने का माध्यम है वहीँ ये आने वाले समय बहुत बड़ी क्रांति का सूत्रधार भी बनेगा | इसीलिए तो लेख का शीर्षक रखा है "फेसबुक" तुम्हारी जय हो |

तेरा इमोशनल अत्याचार....................

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि अगर इस देश की जनता इमोशनल न होती तो क्या होता? हम भारतीय इमोशनल होते हैं यह तो तय है पर हम कभी कभी इतने इमोशनल हो जाते हैं कि भावनाओं में बह जाते हैं और अपना अच्छा बुरा समझे बगैर कई बार गलत फैसले ले लेते हैं | हमारे दैनिक जीवन में अक्सर ऐसी घटनाएं होती हैं जो ये साबित करती हैं कि हम इमोशनल FOOLS हैं | अभी दिवाली आ रही है और हर बड़े छोटे न्यूज़ चैनल पर और अखबारों में ब्रेकिंग न्यूज़ आएगी “अमुक जगह पर इतने क्विंटल मिलावटी मिठाई और खोया पकड़ा गया” और इसी न्यूज़ के बीच में कैडबरी का विज्ञापन आएगा एक बेटा अपने माता पिता को एक चोकलेट का डिब्बा गिफ्ट करता है और नेपथ्य में आवाज़ आती है “इस दिवाली आप किसे खुश कर रहे हैं” बस भैया जी हो गए इमोशनल ! जहाँ समस्या और समाधान एक ही जगह पर उपलब्ध हो तो परेशानी काहे की ! फिर चाहे ACC Cement वाले दादा और पोते की कहानी हो या  Axis Bank का यह बताना कि ज़िन्दगी की रेस में कोई अकेला नहीं बढ़ता, Anchor Switches अगर संवेदना का प्रतीक हैं तो Fevicol जुडाव का, और तो और बिना Tanishq  के हीरे की अंगूठी दिए यदि आप यह कहते हैं कि मुझे मेरी बीवी से प्यार है तो शायद आप की बीवी ही यकीन न करे  | आने वाले दिनों में हमारी आत्मकथाएं तब तक पूरी नहीं मानी जाएँगी जब तक उसमे “My Maggi My Story”  न शामिल हों | पर जनाब ! ये तो सिर्फ बानगी है अपने घर में नज़र दौड़ा कर देखिये तो हर जगह कुछ न कुछ ऐसा ही मिलेगा जो हमारी भावनाओं से जुड़ा होगा |

असल में ये माना जाता है जीवन में हम जो भी फैसले लेते हैं उनमे 90% फैसले दिल से और सिर्फ 10% दिमाग से सोच कर लिए जाते हैं और आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में हमारी भावनाओं पर चोट करके अपना उत्पाद बेच लेना कंपनियों के लिए सबसे आसान रास्ता है |

परन्तु इमोशनल होने की हमारी आदत केवल उत्पादों को खरीदने तक सीमित होती तो भी कोई हर्ज़ नहीं था पर हम लोग तो अपना नेता चुनते समय भी इमोशनल हो जाते हैं और हमें इमोशनल करके राजनैतिक दल अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं |

थोडा सा इतिहास पर नज़र डालें तो पता लगेगा चुनावों के समय हम लोग कब कब इमोशनल हुए | हम पहली बार 1984 में बेहद इमोशनल हुए, और देश के इतिहास में विभाजन की त्रासदी के बाद हुए सबसे बड़े नरसंहार के बावजूद हमने कांग्रेस को 414 लोकसभा सीट दिलवा दी, नतीजा! देश ने आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा घोटाला बोफोर्स कांड के रूप देखा | हम दूसरी बार 1991 में इमोशनल हुए, कांग्रेस की सरकार बनी, नतीजा! नरसिम्हा राव की सरकार में हमने शेयर घोटाला, सांसद घूस कांड, जैन हवाला, लखूभाई पाठक रिश्वत कांड, और न जाने क्या क्या ! हम तीसरी बार फिर 2004 में इमोशनल हो गए सोनिया गाँधी जी के लिए और नतीजा आज तक हम सब भुगत रहे हैं | पिछले 9 वर्षों में क्या क्या घोटाले हुए हैं ये बताने के लिए मुझे ब्लॉग नहीं किताब लिखनी पड़ेगी |


पर मज़ेदार बात यह है कि जब देश में एक जबरदस्त कांग्रेस विरोधी माहौल है और गाँधी परिवार और राहुल गाँधी के पास न कोई मुद्दा है न कोई एजेंडा, न तो ये अपनी सरकार की उपलब्धियां देश को बता सकते हैं (कोई होती तो जरूर बताते), और न ही भविष्य की योजनायें, तो हाज़िर है! आप सब के सामने माननीय राहुल गाँधी जी ! अपना पारिवारिक कहानियों का पिटारा लेकर जिसमे कभी माँ की कहानी होती है कभी दादी और पापा की और अपने उसी इमोशनल अत्याचार के सहारे एक बार फिर सहानभूति बटोरने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं | पर क्या इस बार ये अस्त्र चलेगा ? ये तो जनता को तय करना है यानि की आप को और हमको तो तैयार रहिये चुनाव के पहले इसी तरह के और भी न जाने कितने इमोशनल अत्याचार हम लोगों को झेलने पड़ेंगे ?

Monday, October 21, 2013

कोऊ नृप होए, हमें का हानी !

मित्रों अक्सर जब देश में चुनाव होना वाला होता है तो जनता के बीच एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का होता जो निम्न बातें कहते हुए मिल जाते हैं 

1.मुझे राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है|
2.सारे नेता चोर हैं किसे वोट दे?
3.मैं तो किसी को वोट नहीं दूंगा|
4.कोई भी सरकार बन जाये हमें क्या फर्क पड़ेगा?


पर ऐसे ही लोग जब जीवन में समस्याओं से रूबरू होते हैं तो सरकार, अफसरों, या नेताओं को कोसने से नहीं चूकते हैं | मेरा मानना हैं ऐसे लोग जो लोकतंत्र के इस सबसे बड़े युद्ध में अपनी भागीदारी नहीं देते हैं और तटस्थ रहते हैं वे लोग उन भ्रष्ट नेताओं और अफसरों से ज्यादा बड़े अपराधी हैं जिनके कारण आज हमारा देश समस्यायों से घिरा हुआ है |

शायद ऐसे ही लोगों के लिए राष्ट्रकवि दिनकर ने ये पंक्तियाँ लिखी थी

"
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।"

होली पर व्यंग्य कविता

 होली पर व्यंग्य कविता  अबकी होली पर दिल्ली ने बदला ऐसा रंग, छोड़ आप का साथ हो गयी मोदी जी के संग, मोदी जी के संग करो मत महंगाई की बात, अपने ...