Friday, June 3, 2016

चुप बैठो........!

क्यों आवाज़ उठाते हो तुम, चुप बैठो !
किसे यहाँ समझाते हो तुम, चुप बैठो !
यहाँ सभी मुर्दा हैं तुम भी मर जाओ,
क्यों आत्मा जगाते हो तुम, चुप बैठो !

बचपन से समझाया सबने,
पाठ यही सिखलाया सबने,
किसी के चक्कर में मत पड़ना,
अपने काम से मतलब रखना,
क्या तुमको यह शौक लग गया,
क्यों समाज का रोग लग गया,
सीधी-साधा काम करो तुम,
घर जाकर आराम करो तुम,
कोई रिश्वत ले, लेने दो,
तुम भी ले सकते हो तो लो,
होता है जो काम किसी का तो होने दो,
काहे टाँग अड़ाते हो तुम चुप बैठो !
क्यों आवाज़ उठाते हो तुम, चुप बैठो !
किसे यहाँ समझाते हो तुम, चुप बैठो !

सबका अपना अपना धंधा,
चाहे चोखा, चाहे मन्दा,
कितनी भी बेईमानी कर लें,
कभी न होते वो शर्मिंदा !
नेता, अफसर और व्यापारी,
एक ट्रेन की सभी सवारी,
तुम भी इस गाड़ी में बैठो,
तुमको "सच" की लगी बीमारी,
अपने दिल की करो दवाई,
जैसे भी हो करो कमाई !
अन्याय को देख निगाहें नीची कर लो,
क्यों तन्हा चिल्लाते हो तुम चुप बैठो !
क्यों आवाज़ उठाते हो तुम, चुप बैठो !
किसे यहाँ समझाते हो तुम, चुप बैठो !

जाति-धर्म पर झगड़े होते हैं होने दो,
हर मज़हब के पिछड़े रोते हैं रोने दो,
तुमको उनकी लाचारी से क्या मतलब है,
उन बच्चों की बीमारी से क्या मतलब है !
तुम अपने कमरे में बैठो, टीवी देखो,
अपने मम्मी-पापा, बच्चे बीवी देखो !
सरकारों का काम है यह उनको करने दो,
इसके लिए बनी संसद, उनको लड़ने दो ।
अच्छी खासी सुलझी सी ज़िंदगी चलाओ,
क्यूँ जीवन उलझाते हो तुम, चुप बैठो !
क्यों आवाज़ उठाते हो तुम, चुप बैठो !
किसे यहाँ समझाते हो तुम, चुप बैठो !

::::::
अम्बेश तिवारी
03.06.2016

Thursday, June 2, 2016

एक ग़ज़ल की कोशिश !

बिना बुलाये मेरे घर में मेहमाँ बन आ जाता है,
न जाने क्या ऐसा मेरा रंजोगम से नाता है !
अब रोटी दाना पानी की कोई फ़िक्र नहीं मुझको,
जो मालिक जीवन देता है वो ही भूख मिटाता है !
बातों में सच्चाई हो और पीड़ा में गहराई हो,
आँखों से बहता पानी तब गंगाजल हो जाता है !
चाँद लिए तारों की सेना लड़ता है अँधियारों से,
सुबह तलक पर वो बेचारा तनहा ही रह जाता है !
सारी दुनिया छोड़ दे मुझको ! पर कोई परवाह नहीं,
माँ तेरे जाने के डर से मेरा मन घबराता है !

:::::::अम्बेश तिवारी
02.06.2016

Wednesday, June 1, 2016

एक उभरते हुए नए कवि के दिल का दर्द !

मित्रों यह एक व्यंग्य रचना है जिसमें मैंने बताने की कोशिश की है आजकल के दौर में नए नए कवि बने लोग खुद को मशहूर करवाने के लिए क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं ! पढ़िए और मज़ा लीजिये !

मैं हूँ एक छोटा सा कवि मुझको फेमस करवा दो तुम,
मेरी कविता और फ़ोटो, अखबारों में छपवा दो तुम !
नहीं मांगता रुपया पैसा, बस इतनी सी विनती है,
मेरी कविताओं पर लोगों से वाह-वाह सुनवा दो तुम ।
मैं हूँ एक छोटा सा कवि.......

सुबह सवेरे एक सिगरेट की डिब्बी रोज़ मंगाता हूँ,
शाम ढले तक मित्रों और मदिरा संग धुआं उडाता हूँ ।
ग़ालिब, मीर, फैज़ की ग़ज़लें रात रात भर पढ़ता हूँ,
उनसे लफ्ज़ चुराकर फिर मैं अपनी ग़ज़ल बनाता हूँ ।
उन ग़ज़लों को किसी पत्रिका में स्थान दिला दो तुम,
कवि सम्मेलन में चाहे बिन पैसे के पढ़वा दो तुम ।
मैं हूँ एक छोटा सा कवि..............

सुंदरियों का फ़ोटो रखकर प्रेम प्रेरणा पाता हूँ,
चैटिंग, डेटिंग, ट्विटर, फेसबुक सब पर समय बिताता हूँ।
टीवी और रेडियो पर मैं गीत पुराने सुनता -हूँ,
उलट पलट कर फ़िल्मी मुखड़े अपना गीत बनाता हूँ ।
इन गीतों को शादी में ढोलक पर ही बजवा दो तुम,
और बरात में चाहे इन पर नागिन डांस करा दो तुम ।
मैं हूँ एक छोटा सा कवि...............

के.पी. सक्सेना के व्यंग्य को अपना व्यंग्य बताता हूँ,
और काका के छंद चुरा कर छंदकार बन  जाता हूँ,
नीरज के अंदाज़ में गाता, बच्चन जी की मधुशाला,
और कुमार विश्वास के जैसे किस्से खूब सुनाता हूँ।
तुम्ही कहो अब करूँ और क्या ? कुछ तो काम दिला दो तुम,
और कुछ नहीं तो छोटा सा एक सम्मान करा दो तुम।

मैं हूँ एक छोटा सा कवि मुझको फेमस करवा दो तुम,
मेरी कविता और फ़ोटो, अखबारों में छपवा दो तुम !
नहीं मांगता रुपया पैसा, बस इतनी सी विनती है,
मेरी कविताओं पर लोगों से वाह-वाह सुनवा दो तुम ।


::::::अम्बेश तिवारी 
०१.०६.२०१६ 

Wednesday, May 18, 2016

मत लेना तुम मेरा नाम !

मत लेना तुम मेरा नाम !

तुम्हें सैकड़ों काम पड़े हैं, तुम अतिव्यस्त जगत के प्राणी !
कैसे तुम्हें सुनाऊँ अपने, अंतर्मन की करूण कहानी !
मेरा जीवन काँटों जैसा, तुम फ़ूलों से ज्यादा कोमल,
तुम जैसे निर्मल गंगा हो, मैं बारिश का बहता पानी,
अपना जगमग शहर संभालो, छोड़ो मेरा उजड़ा ग्राम !

मत लेना तुम मेरा नाम !

बड़े बड़े हैं ख़्वाब तुम्हारे, और बड़ा सा एक संसार ;
मेरे सपने लाश हो गए, जिन्हें न मिलते कन्धे चार ।
तुम्हें सुलभ हैं सब सुख साधन, मैं श्रमजीवी कृषक समान,
तुम जैसे अतिशीघ्र सफलता, मैं जैसे बिकता व्यापार !
मैं क्या हूँ अब तुम मत सोचो, तुमको मुझसे अब क्या काम !
मत लेना तुम मेरा नाम !

:::::अम्बेश तिवारी
18.05.2016

Monday, May 16, 2016

तुम नेता बन जाओ !

बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !
खूब मिलेगा नाम के तुम नेता बन जाओ !

शहर में पूरा रौब तुम्हारा छा जाएगा, 
हर अफसर चपरासी तुमसे घबराएगा ।
पाँचो ऊँगली घी में होंगी, सिर कढ़ाही में, 
जीत तुम्हारी ही होगी हर इक लड़ाई में ।
उतने ही मशहूर बनोगे, धाक जमेगी, 
जितने हो बदनाम कि तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

अपनी एक छोटी सी सेना जल्द बनाओ, 
औरों को भी रोज़गार उसमे दिलवाओ ।
कुछ बकैत लड़के, कुछ पहलवान जैसे हों, 
इनको दारू मुर्गा तुम हर रोज़ खिलाओ,
किसी बड़े नेता से मिलकर सेटिंग कर लो, 
आओ उनके काम के तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

चंदे का व्यापार, जुआँ सट्टा चलवाओ, 
बिना बात के रोज़ कहीं कट्टा चलवाओ,
लोकल थाना पुलिस प्रशासन से मिलजुल कर, 
दो नंबर का दारू का अड्डा चलवाओ !
जो कोई भी आये रास्ते में तुम उसका, 
कर दो काम तमाम कि तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

हर ऊँगली में रहे अंगूठी, कमर में पिस्टल, 
गाड़ी में रखी हों दो व्हिस्की की बोटल,
चेले हों दो चार तुम्हारे दायें बाएं ! 
बियर बार में जाकर खूब मचाओ हलचल,
सुरा-सुन्दरी पर जमकर रुपया बरसाओ, 
अय्याशी हर शाम कि तुम नेता बन जाओ ।
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

रुपया लेने में तुम मोल भाव न करना, 
हिन्दू मुस्लिम में भी भेदभाव न करना,
चाहे कोई हो गरीब, निर्धन, असहाय, 
कोई तुम्हारी गिद्ध दृष्टि से बच न पाये ।
धंधे में तुम कभी न करना कोई मुरव्वत, 
लेना सबसे दाम के तुम नेता बन जाओ |
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

जब चुनाव हो शहर में तुम दंगा करवाओ, 
लोकतंत्र को सरेआम नंगा करवाओ,
विरोधियों की हत्या होती है होने दो, 
अपना सारा खेल भला चंगा करवाओ ।
टिकट मिले बन जाओ विधायक किसी तरह से, 
तब करना आराम के तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !
खूब मिलेगा नाम के तुम नेता बन जाओ !


::::::अम्बेश तिवारी 

Saturday, May 14, 2016

मैं गीत यही दोहराता हूँ !!

मैं गीत यही दोहराता हूँ !

जीवन की करुण वेदना से,
जब कुंठित मन हो जाता हूँ ;
तब गीत यही दोहराता हूँ !
मैं गीत यही दोहराता हूँ !

दिनकर की स्वर्ण रश्मियां जब,
पट खोल धरा पर नृत्य करें,
या सघन मेघ उनके पथ पर,
आकर उनको अवरूद्ध करें !
हो ग्रीष्म काल की शुष्क पवन,
या शीतल शिशिर समीर बहे ;
पर कर्मशील मानव-जीवन,
अपनी गति से गतिमान रहे !
इस जीवन-गति दावानल में,
जल कर मैं भस्म हो जाता हूँ,
कुछ और न तब कह पाता हूँ,
मैं गीत यही दोहराता हूँ !

यह बंधु-बांधव, लौकिक जन,
धन-धान्य, सम्पदा, आभूषण,
घेरे मुझको ऐसे जैसे,
कोई विषधर फैलाये फन,
कुछ प्रेमी जन हैं पर वो भी,
निज स्वार्थ विवश, निज कर्म मगन,
मेरे अंतर की पीड़ा पर,
रोता मेरा ही अंतर्मन ;
जब अपने मन की बातों को,
अपनों से नहीं कह पाता हूँ
तब गीत यही दोहराता हूँ !
मैं गीत यही दोहराता हूँ !

मेरी पीड़ा इतनी सी बस,
कोई जग में पीड़ित न हो,
कोई निर्धन लाचार दुखी,
कोई अस्वस्थ, व्यथित न हो,
न धन के लिए कहीं कोई,
भ्राता-भ्राता में हो विवाद,
कोई अधर्म पाखण्ड कपट,
छल, माया बीच भ्रमित न हो ;
इन इच्छाओं को इस युग में,
मृतप्रायः सदा ही पाता हूँ,
कुछ और न तब कह पाता हूँ ;
मैं गीत यही दोहराता हूँ !!

अम्बेश तिवारी
::14.05.2016

Thursday, May 12, 2016

इस किताब का पन्ना पन्ना तेरा है !

शब्दों का यह बहता दरिया तेरा है,
मैं जो भी लिखता हूँ चर्चा तेरा है !

मौसम की यह धूप सुनहरी, सर्द हवाएं,
और बसंती ऋतु का पहरा तेरा है !

जो भी ख्वाब खुदा ने मुझको बख्शे हैं,
उन ख्वाबों का कतरा कतरा तेरा है !

जितनी उम्र कटी तेरे बिन ख़ाक हुई,
अब जीवन का लम्हा लम्हा तेरा है !

तुझको छोड़ के जाऊं भी तो जाऊं कहाँ,
मेरा सब सुख चैन, बसेरा तेरा है !

जब अपना सर्वस्व तुम्हीं को सौंप दिया,
तब जो कुछ मेरा है, वो सब तेरा है !

इक-इक कविता, गीत, ग़ज़ल में तुम शामिल हो
इस किताब का पन्ना, पन्ना तेरा है !

:::::अम्बेश तिवारी
12.05.2016

होली पर व्यंग्य कविता

 होली पर व्यंग्य कविता  अबकी होली पर दिल्ली ने बदला ऐसा रंग, छोड़ आप का साथ हो गयी मोदी जी के संग, मोदी जी के संग करो मत महंगाई की बात, अपने ...