Sunday, July 17, 2016

माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

जब से मम्मी हमसब को छोड़ कर गईं हैं ऐसा लगता है सारा संसार सूना हो गया है ! न तो ऑफिस में ही मन लगता है न ही  कुछ लिखने की इच्छा होती है ।

ऐसे में मम्मी के जाने के बाद अपने अंतर्मन की भावनाओं को कलमबद्ध करने का छोटा सा प्रयास किया है । यह कविता माँ के बारे में नहीं है बल्कि माँ के जाने के बाद मेरी क्या स्थिति है उसके बारे में है -

माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

मेरे अंतर्मन में तुम हो,
और आँखों में रची बसी हो ।
मेरा मन बस यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

रोज रात को जब घर लौँटू,
लगे कि रस्ता ताक रही हो ।
मुझे खिलाने को खाना तुम,
अब तक भूखी जाग रही हो ।
रोज़ सवेरे मुझे जगाने को,
आवाज़ लगाती हो तुम।
मेरी हर चिंता में अपनी
काया सदा गलाती हो तुम ।
सब कहते हैं चली गयीं तुम,
अब दुनिया में कहीं नहीं हो ।
पर मेरा मन यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

कितने कष्ट सहे तुमने पर,
अपना दुखड़ा कभी न रोया ।
हम बच्चों की खातिर तुमने,
अपना तन मन जीवन खोया ।
आशावान बने रहने का,
पाठ सदा सिखलाती हो तुम ।
चाहे कैसी भी विपदा हो,
साहस सदा दिलाती हो तुम ।
चिता में जलने से पहले तुम,
कष्टों में सौ बार जली हो ।
पर मेरा मन यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो ।

एक तुम्हारे होने भर से,
घर में कितना उजियारा था ।
कितनी बार हमारी खातिर,
तुमने अपना मन मारा था ।
मैं चाहे गुस्सा हो जाऊं,
तुम नाराज़ नहीं होती थी ।
किसे बताऊँ इस दुनिया में,
मैं तुमको सबसे प्यारा था ।
कभी जो पूरी न हो पाये,
जीवन की वो एक कमी हो ।
फिर भी मेरा मन कहता है,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो ।

जब जाऊँगा कहीं काम से,
टीका कौन लगाएगा माँ ।
बीमारी में थपकी देकर,
मुझको कौन सुलायेगा माँ !
कौन बलाएं लेगा मेरी,
किसे कहूँगा दुःख अपना ।
दुनिया भर की बुरी नज़र से,
मुझको कौन बचाएगा माँ !
कैसे रह पाऊंगा तुम बिन,
क्यों तुम हमसे रूठ गई हो !
रो रो कर मन यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

घर के हर कमरे में तुम हो,
आँगन में, चौके में तुम हो ।
होली और दीवाली में तुम,
खुशियों के मौके में तुम हो ।
बच्चों की किलकारी में तुम,
कपड़ों की अलमारी में तुम ।
दान धर्म व्रत पूजा में तुम,
परजों की त्योहारी में तुम ।
हम सब की लाचारी में तुम,
पापा की बीमारी में तुम,
इस घर का आधार तुम्ही हो,
घर की चारदीवारी में तुम,
मैं कैसे यह मानूँ के तुम,
चली गई हो, कहीं नहीं हो ।
मेरा मन अब तक कहता है,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

::अम्बेश तिवारी
12-07-2016

Post a Comment