Monday, April 25, 2016

मेरे बचपन के राजा मेरे पिता !


अभी कुछ दिनों पहले मेरे पिता की एक सर्जरी हुई थी| अस्पताल से घर आने के बाद कल उनसे बात करते हुए पहली बार मुझे यह आभास हुआ कि शायद बीमारी और कमजोरी के कारण वो काफी थका हुआ महसूस कर रहे थे| या फिर आयु अब धीरे धीरे उन पर अपना असर दिखा रही है| एक पुत्र के लिए यह बेहद अजीब और असहज अनुभूति होती है जब उसके पिता जो हमेशा उसके लिए उर्जा का श्रोत रहे हो स्वयं को उर्जाविहीन और थका हुआ महसूस करें | यह कविता मेरे पिता और उनकी आयु के सभी पिताओं को समर्पित है –

जिस बरगद की छाँव में बचपन,खुद का बढ़ते देखा मैंने,

उस बरगद के  ऊपर अब एक, उम्र को चढ़ते देखा मैंने,

पके पकाए आम हैं खाए, अब तक जिसकी मेहनत के ,

कल उससे सूखे मुरझाये,पत्ते झड़ते देखा मैंने,

मैं जिनसे रोशन हूँ, जिनमें मैं सपनों सा रहता हूँ, 

चाँद सी उन आँखों के नीचे, धब्बे पढ़ते देखा मैंने,

जो हाथों पर थाम मुझे, आकाश झुलाया करते थे,

कल उनको डगमग क़दमों से झुक कर चलते देखा मैंने,

रात  रात  भर  जाग  के  मेरी, पहरेदारी  करने  वाली , 

बोझिल थकती आँखों को अब, नींद में जगते देखा मैंने,

ताज नहीं कोई, राज नहीं पर,  फिर भी राजा लगते थे,

बचपन के उस राजा को कल, बाप में ढलते देखा मैंने,

जिस बरगद की छाँव में बचपन,खुद का बढ़ते देखा मैंने,

उस बरगद के  ऊपर अब एक, उम्र को चढ़ते देखा मैंने|

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