Sunday, August 14, 2016

माँ ने मुझे इंसान को पढ़ना सिखा दिया !

1

कैसे भी मुश्किलात हों लड़ना सिखा दिया,
ठोकर लगे तो गिर के संभलना सिखा दिया ।
अब मुझको ज़माने के तौर हो गए मालूम,
माँ ने मुझे इंसान को पढ़ना सिखा दिया !
दो वक़्त की रोटी तो थी पहले भी कमाई,
कैसे हो बरक्कत मुझे करना सिखा दिया !

2

तेरे बिन यह शहर कितना अज़ीब लगता है,
चाहने वाला भी मुझको रक़ीब लगता है,
जिनके सर पे है उनकी माँ का साया अब मुझको,
ऐसा हर शख्स बड़ा खुशनसीब लगता है !

Thursday, August 11, 2016

कुछ मुक्तक -

कुछ मुक्तक -

1.
सावन में बादलों के आँसू निकल रहे हैं,
जैसे धरा से मिलने को वो मचल रहे हैं ।
जब से हुई मोहब्बत दोनों का हाल यह है,
तुम भी फिसल रहे हो, हम भी फिसल रहे हैं ।

2.

जो दोस्त अपना हमको कब से बता रहीं थीं,
पैसे भी हमारे वो जम कर उड़ा रहीं थीं ।
पहुँचे जब उनके घर पर इज़हारे इश्क़ करने,
डोली में बैठ कर वो ससुराल जा रहीं थीं !

3
इस दिल में मोहब्बत के कुछ दीप जल न पाये,
तुमने की बेवफाई, और हम संभल न पाये।
दुनिया बदल गई है, मौसम बदल गए हैं,
तुम भी बदल गए हो, पर हम बदल न पाये ।

4

तुमने तो समझा जुगनू, महताब बन गया मैं,
तेरे सभी सवालों का जवाब बन गया मैं ।
तुमने बिना पढ़े ही ठुकरा दिया था जिसको,
अब पढ़ रहा ज़माना वो किताब बन गया मैं !

5

कभी शोला कभी शबनम कभी अंगार लिखेंगे,
कभी आँसू की नदिया और कभी मझधार लिखेंगे !
हम अपनी ज़िन्दगी की दास्ताँ जब भी लिखेंगे तब,
तुम्हारा नाम लिखेंगे, तुम्हारा प्यार लिखेंगे !

Friday, August 5, 2016

बड़ा ही मुश्किल है !

किसी से दिल का लगाना बड़ा ही मुश्किल है
आज कल मिलना मिलाना बड़ा ही मुश्किल है,
दूर जो रहता है वो दौड़ के आ जाएगा,
पास वालों को बुलाना बड़ा ही मुश्किल है !
ग़मों का बोझ इस कदर बढ़ा है चेहरे पर,
आज कल हँसना हँसाना बड़ा ही मुश्किल है !
प्राइवेट नौकरी और उसपे यह महँगाई की मार,
इस तरह घर को चलाना बड़ा ही मुश्किल है !
मंच पर आजकल बस चुटकुले ही चलते हैं,
दिल की कविताएं सुनाना बड़ा ही मुश्किल है !
कहीं भी इतनी मोहब्बत न मिलेगी तुझको,
यह वतन छोड़ के जाना बड़ा ही मुश्किल है !
तालियां ही नहीं पेमेंट भी देना वरना,
फिर से 'अम्बेश' का आना बड़ा ही मुश्किल है !

--------अम्बेश तिवारी "अम्बेश"

Monday, August 1, 2016

एक छंद सैनिकों के नाम -

कब तक बातें होंगी और मुलाक़ातें होंगी,
सैनिकों के शव हम कब तक उठाएंगे !
सुधरा नहीं जो कभी आज कैसे सुधरेगा,
अहिंसा का पाठ उसे कब तक पढ़ाएंगे !
हम भेजें चिट्ठियां वो भेजते आतंकियों को,
ऐसा यह व्यापार हम कब तक चलाएंगे !
पीठ पे लिए हैं घाव एक नहीं बार-बार,
छप्पन इंची सीना उन्हें कब हम दिखाएंगे !

::::अम्बेश तिवारी

Tuesday, July 26, 2016

सलमान बरी हो जाते हैं !

बड़े बड़े घोटाले कर बेईमान बरी हो जाते हैं,
सौ गुनाह करके अमीर इंसान बरी हो जाते हैं ।
हिरन ख़ुदकुशी कर लेता है, गाड़ी खुद ही चलती है,
कोर्ट में यह साबित करके सलमान बरी हो जाते हैं ।

::::अम्बेश तिवारी
26.07.2016

Thursday, July 21, 2016

"माँ" तुम्हारे बिन मगर यह ज़िन्दगी कटती नहीं !

जब से माँ हमें छोड़ कर गईं हैं एक-एक दिन जैसे एक एक बरस की तरह निकलता है । अभी कुल 18 दिन बीते हैं पर ऐसा लग रहा है कि एक सदी बीत गई हो ! लोग आते हैं, समझाते हैं, चले जाते हैं पर मैं अब भी वहीँ खड़ा हूँ ! समझ नहीं आता क्या करूं ?

आज कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं -

रोज़ निकले चाँद सूरज, यह घड़ी रूकती नहीं,
कितना भी मुट्ठी में पकड़ो, रेत पर टिकती नहीं,
सब मुझे समझा रहे आगे बढ़ाओ ज़िन्दगी,
"माँ" तुम्हारे बिन मगर यह ज़िन्दगी कटती नहीं !
तुमने इतना था दिया जिसको मैं गिन सकता नहीं,
फिर भी जाने ख्वाहिशें कितनी हैं जो मरती नहीं !
सैकड़ों रिश्ते यहाँ हैं सब मगर वीरान हैं,
एक माँ-बेटे के रिश्ते की ख़लिश घटती नहीं !
लाख समझाया मगर यह दिल मेरी सुनता नहीं,
और माँ तेरी यह सूरत से आँख से हटती नहीं !
दूसरों को सीख देना है बड़ा आसान पर,
खुद पे जब आती मुसीबत तब ज़ुबाँ खुलती नहीं !

:::::::अम्बेश तिवारी "अम्बेश"
21.07.2016

Sunday, July 17, 2016

माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

जब से मम्मी हमसब को छोड़ कर गईं हैं ऐसा लगता है सारा संसार सूना हो गया है ! न तो ऑफिस में ही मन लगता है न ही  कुछ लिखने की इच्छा होती है ।

ऐसे में मम्मी के जाने के बाद अपने अंतर्मन की भावनाओं को कलमबद्ध करने का छोटा सा प्रयास किया है । यह कविता माँ के बारे में नहीं है बल्कि माँ के जाने के बाद मेरी क्या स्थिति है उसके बारे में है -

माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

मेरे अंतर्मन में तुम हो,
और आँखों में रची बसी हो ।
मेरा मन बस यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

रोज रात को जब घर लौँटू,
लगे कि रस्ता ताक रही हो ।
मुझे खिलाने को खाना तुम,
अब तक भूखी जाग रही हो ।
रोज़ सवेरे मुझे जगाने को,
आवाज़ लगाती हो तुम।
मेरी हर चिंता में अपनी
काया सदा गलाती हो तुम ।
सब कहते हैं चली गयीं तुम,
अब दुनिया में कहीं नहीं हो ।
पर मेरा मन यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

कितने कष्ट सहे तुमने पर,
अपना दुखड़ा कभी न रोया ।
हम बच्चों की खातिर तुमने,
अपना तन मन जीवन खोया ।
आशावान बने रहने का,
पाठ सदा सिखलाती हो तुम ।
चाहे कैसी भी विपदा हो,
साहस सदा दिलाती हो तुम ।
चिता में जलने से पहले तुम,
कष्टों में सौ बार जली हो ।
पर मेरा मन यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो ।

एक तुम्हारे होने भर से,
घर में कितना उजियारा था ।
कितनी बार हमारी खातिर,
तुमने अपना मन मारा था ।
मैं चाहे गुस्सा हो जाऊं,
तुम नाराज़ नहीं होती थी ।
किसे बताऊँ इस दुनिया में,
मैं तुमको सबसे प्यारा था ।
कभी जो पूरी न हो पाये,
जीवन की वो एक कमी हो ।
फिर भी मेरा मन कहता है,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो ।

जब जाऊँगा कहीं काम से,
टीका कौन लगाएगा माँ ।
बीमारी में थपकी देकर,
मुझको कौन सुलायेगा माँ !
कौन बलाएं लेगा मेरी,
किसे कहूँगा दुःख अपना ।
दुनिया भर की बुरी नज़र से,
मुझको कौन बचाएगा माँ !
कैसे रह पाऊंगा तुम बिन,
क्यों तुम हमसे रूठ गई हो !
रो रो कर मन यही पुकारे,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

घर के हर कमरे में तुम हो,
आँगन में, चौके में तुम हो ।
होली और दीवाली में तुम,
खुशियों के मौके में तुम हो ।
बच्चों की किलकारी में तुम,
कपड़ों की अलमारी में तुम ।
दान धर्म व्रत पूजा में तुम,
परजों की त्योहारी में तुम ।
हम सब की लाचारी में तुम,
पापा की बीमारी में तुम,
इस घर का आधार तुम्ही हो,
घर की चारदीवारी में तुम,
मैं कैसे यह मानूँ के तुम,
चली गई हो, कहीं नहीं हो ।
मेरा मन अब तक कहता है,
माँ तुम अब भी यहीं कहीं हो !

::अम्बेश तिवारी
12-07-2016

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