Tuesday, June 21, 2016

कुछ छंद !

1.
आया हूँ सुनाने आपको मैं कविताएं पर,
मेरी कविताओं में न कुछ भी विशेष है !
भूख है, उदासी है, तपन धूप की मिलेगी,
कभी जो न पूरे होते सपने वो शेष हैं ।
इश्क़ और आशनाई कैसे मैं सुनाऊँ जब,
जाति-धर्म मज़हबों में बँट रहा यह देश है !
मेरे गीतों में मिलेगा कष्ट आम आदमी का,
दर्द बांटता हूँ मेरा नाम "अम्बेश" है !

2.
चुटकुले सुना के लोग पा गएं हैं पद्मश्री,
औ हम जैसे लोग कवितायेँ पढ़ते रहे !
भूखे पेट सो जाते हैं बच्चे मजदूर के,
औ सेठों के गोदामों में अनाज सड़ते रहे !
करके घोटाले सारे नेता मौज काट रहे,
जेलों में बेचारे बे-कसूर मरते रहे !
मर गया किसान जो चुका न पाया क़र्ज़ और,
माल्या जी लंदन उड़ान भरते रहे ।

3.
आदमी नहीं हैं हम, वोट बैंक हैं महज,
उनको जिताया था अब इनको जिताएंगे ।
पूँजीपतियों के बनते रहेंगे ताजमहल,
हम जैसे लोग झोपड़ी में रह जाएंगे ।
साठ साल एक परिवार ने दिखाए स्वप्न,
कुछ साल हमें अब ख्वाब यह दिखाएँगे,
पांच साल दे चुके हो, और पांच साल दे दो,
आएंगे जी आएंगे तब अच्छे दिन आएंगे ।

4.

ज़िन्दगी की भट्टी में जो रात दिन जल रहे
उनको मुहब्बतों की आग क्या जलायेगी !
श्रम के पसीने से जो भीगता बदन यहाँ,
सावन की बारिश क्या उनको भिगायेगी !
खून के जो आँसू रोते रहते हैं उम्र भर,
इश्क़ की कहानी कैसे उनको रुलाएगी !
रोटी की फिकर में जो जागते हैं रात भर,
याद महबूब की क्या उनको जगाएगी !

5.

कब तक बातें होंगी और मुलाक़ातें होंगी,
सैनिकों के शव हम कब तक उठाएंगे !
सुधरा नहीं जो कभी आज कैसे सुधरेगा,
अहिंसा का पाठ उसे कब तक पढ़ाएंगे !
हम भेजें चिट्ठियां वो भेजते आतंकियों को,
ऐसा यह व्यापार हम कब तक चलाएंगे !
पीठ पे लिए हैं घाव एक नहीं बार-बार,
छप्पन इंची सीना उन्हें कब हम दिखाएंगे !

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